Cheque Bounce Case Kya Hai? Notice Se Court Tak Puri Process (2026 Guide)
आज के समय में व्यापार, नौकरी, उधार या किसी भी प्रकार के भुगतान के लिए चेक का उपयोग किया जाता है। लेकिन कई बार ऐसा होता है कि जिस व्यक्ति ने आपको चेक दिया है उसके बैंक खाते में पैसा पर्याप्त नहीं होने के कारण बैंक चेक को स्वीकार नहीं करता और भुगतान करने से इंकार कर देता है। इस स्थिति को चेक बाउंस (Cheque Bounce) कहा जाता है। इस लेख में जानेंगे की चेक बाउंस मामला क्या है |
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| चेक बाउंस मामला - नोटिस से कोर्ट तक की पूरी कानूनी प्रक्रिया | धारा 138 एनआई एक्ट हिंदी गाइड |
यदि चेक किसी वैध देनदारी (जैसे उधार, व्यापारिक भुगतान या किसी कानूनी लेन-देन) के लिए दिया गया था और वह बाउंस हो जाता है, तो चेक देने वाले व्यक्ति के विरुद्ध आप सक्षम न्यायालय में उसके खिलाफ मुकदमा कर सकते है व कानून की सहायता लेकर संबंधित व्यक्ति के विरुद्ध कार्रवाई कर सकता है।
भारत में चेक बाउंस मामला क्या है इससे जुड़े प्रावधान परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 (Negotiable Instruments Act, 1881) की धारा 138 में किया गया है।
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Cheque Bounce Kya Hota Hai?
Cheque Bounce Hone Ke Pramukh Karan ?
चेक बाउंस होने के कई कारण हो सकते हैं, जिनमें प्रमुख हैं—
1. खाते में पर्याप्त राशि न होना
यदि चेक जारी करने वाले व्यक्ति के बैंक खाते में पर्याप्त धनराशि नहीं है, तो बैंक भुगतान नहीं करता।
2. हस्ताक्षर का मेल न खाना
यदि चेक पर किए गए हस्ताक्षर बैंक के रिकॉर्ड से अलग हैं, तो चेक अस्वीकार कर दिया जाता है।
3. बैंक खाता बंद होना
यदि जिस खाते से चेक जारी किया गया है वह पहले ही बंद हो चुका है, तो भुगतान नहीं होगा।
4. चेक की वैधता समाप्त होना
निर्धारित अवधि के बाद प्रस्तुत किया गया चेक अमान्य माना जा सकता है।
5. चेक में कटिंग या ओवरराइटिंग
यदि चेक में अधिक कटिंग, सुधार या ओवरराइटिंग हो, तो बैंक सुरक्षा कारणों से भुगतान रोक सकता है।
6. गलत जानकारी भरना
तारीख, राशि या प्राप्तकर्ता का नाम गलत होने पर भी चेक बाउंस हो सकता है।
धारा 138 (NI Act) क्या है?
धारा 138 एक ऐसा कानूनी प्रावधान है, जिसके अंतर्गत यदि किसी व्यक्ति ने किसी वैध देनदारी का भुगतान करने के लिए चेक जारी किया और वह चेक बाउंस हो गया, तो उसके विरुद्ध न्यायालय में मामला दर्ज किया जा सकता है।
इस कानून का उद्देश्य चेक के माध्यम से होने वाले लेन-देन को सुरक्षित और विश्वसनीय बनाना है।
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धारा 138 कब लागू होती है?
धारा 138 तभी लागू होती है जब निम्नलिखित शर्तें पूरी हों—
- चेक किसी वैध देनदारी या ऋण के भुगतान के लिए जारी किया गया हो।
- चेक उसकी वैध अवधि के भीतर बैंक में प्रस्तुत किया गया हो।
- बैंक ने चेक को भुगतान करने से मना कर दिया हो।
- बैंक द्वारा चेक रिटर्न मेमो जारी किया गया हो।
- निर्धारित समय-सीमा के भीतर कानूनी नोटिस भेजा गया हो।
- नोटिस मिलने के बाद भी भुगतान न किया गया हो।
चेक बाउंस होने पर सबसे पहले क्या करें?
चेक बाउंस मामला क्या है, यदि आपका चेक बाउंड हो गया है, तो घबराने की आवश्यकता नहीं है। सबसे पहले निम्नलिखित कदम उठाएँ—
- बैंक से चेक रिटर्न मेमो प्राप्त करें।
- यह दस्तावेज बताता है कि चेक किस कारण से बाउंस हुआ है।
- मूल चेक सुरक्षित रखें।
- मूल चेक भविष्य में न्यायालय में साक्ष्य के रूप में काम आता है।
- सभी बैंक दस्तावेज संभालकर रखें।
- रसीद, बैंक स्टेटमेंट और अन्य दस्तावेज बाद में उपयोगी हो सकते हैं।
- किसी कानूनी विशेषज्ञ से सलाह लें।
- यदि मामला गंभीर है, तो अधिवक्ता से सलाह लेना उचित रहेगा।
चेक बाउंस होने पर कानूनी नोटिस क्यों भेजा जाता है?
यदि चेक बाउंस हो जाता है, तो सबसे पहले संबंधित व्यक्ति को कानूनी नोटिस भेजा जाता है। इस नोटिस का उद्देश्य उसे भुगतान करने का अंतिम अवसर देना होता है।
यदि नोटिस मिलने के बाद भी वह व्यक्ति भुगतान नहीं करता, तो उसके बाद न्यायालय में मामला दायर किया जा सकता है।
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चेक बाउंस होने के बाद कानूनी प्रक्रिया क्या होती है?
यदि बैंक द्वारा आपका चेक बाउंस कर दिया जाता है, तो कानून आपको अपने पैसे की वसूली के लिए एक निश्चित प्रक्रिया अपनाने का अधिकार देता है। नीचे पूरी प्रक्रिया क्रमवार समझाई गई है।
चरण 1: बैंक से चेक रिटर्न मेमो प्राप्त करें
जब बैंक चेक का भुगतान नहीं करता, तो वह चेक रिटर्न मेमो (Cheque Return Memo) जारी करता है। इसमें यह स्पष्ट लिखा होता है कि चेक किस कारण से बाउंस हुआ है, जैसे—
- खाते में पर्याप्त राशि नहीं होना
- हस्ताक्षर मेल न खाना
- खाता बंद होना
- चेक की वैधता समाप्त होना
- अन्य तकनीकी कारण
यह मेमो कोर्ट में महत्वपूर्ण साक्ष्य माना जाता है, इसलिए इसे सुरक्षित रखें।
चरण 2: कानूनी नोटिस भेजें
चेक बाउंस होने के बाद अगला कदम कानूनी नोटिस (Legal Notice) भेजना होता है।
इस नोटिस में सामान्यतः निम्नलिखित बातें लिखी जाती हैं—
- चेक जारी करने वाले व्यक्ति का नाम और पता।
- चेक नंबर, तिथि और राशि।
- बैंक द्वारा चेक बाउंस होने का कारण।
- भुगतान करने की मांग।
- यह सूचना कि भुगतान न होने पर कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
- कानूनी नोटिस किसी अनुभवी अधिवक्ता के माध्यम से भेजना अधिक उचित माना जाता है।
चरण 3: भुगतान की प्रतीक्षा करें
नोटिस प्राप्त होने के बाद यदि संबंधित व्यक्ति निर्धारित कानूनी समय के भीतर भुगतान कर देता है, तो मामला यहीं समाप्त हो सकता है।
यदि वह भुगतान नहीं करता, तो आगे न्यायालय में शिकायत दायर की जा सकती है।
चरण 4: न्यायालय में शिकायत दर्ज करें
यदि नोटिस के बाद भी भुगतान नहीं मिलता, तो संबंधित न्यायालय में धारा 138, परक्राम्य लिखत अधिनियम के अंतर्गत शिकायत दायर की जाती है।
शिकायत में सभी आवश्यक दस्तावेज संलग्न किए जाते हैं।
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कोर्ट में कौन-कौन से दस्तावेज लगते हैं?
मामला दर्ज करते समय सामान्यतः निम्नलिखित दस्तावेजों की आवश्यकता होती है—
- मूल चेक
- बैंक द्वारा जारी चेक रिटर्न मेमो
- कानूनी नोटिस की प्रति
- नोटिस भेजने का प्रमाण (डाक/कूरियर रसीद आदि)
- बैंक खाते का विवरण (यदि आवश्यक हो)
- लेन-देन से संबंधित दस्तावेज (यदि उपलब्ध हों)
- पहचान पत्र
Court Me Case Kaise Chalta hai ?
क्या बीच में समझौता किया जा सकता है?
हाँ।
यदि दोनों पक्ष आपसी सहमति से विवाद समाप्त करना चाहते हैं, तो कई मामलों में न्यायालय की अनुमति से समझौता किया जा सकता है। इससे समय, धन और न्यायालय की कार्यवाही—तीनों की बचत होती है।
चेक बाउंस मामले में संभावित दंड
यदि न्यायालय यह पाता है कि आरोपी ने कानून का उल्लंघन किया है, तो धारा 138 के अंतर्गत कानून में कारावास, जुर्माना या दोनों का प्रावधान है। वास्तविक दंड प्रत्येक मामले के तथ्यों और न्यायालय के निर्णय पर निर्भर करता है।
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चेक बाउंस से कैसे बचें?
भविष्य में ऐसी स्थिति से बचने के लिए निम्नलिखित बातों का ध्यान रखें—
- चेक जारी करने से पहले खाते में पर्याप्त राशि रखें।
- हस्ताक्षर हमेशा बैंक रिकॉर्ड के अनुसार करें।
- चेक पर कटिंग या ओवरराइटिंग न करें।
- सही तारीख और सही राशि लिखें।
- बिना आवश्यकता के किसी को खाली (Blank) चेक न दें।
- भुगतान करने से पहले सभी विवरण एक बार अवश्य जांच लें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
प्रश्न 1. क्या हर चेक बाउंस होने पर मामला दर्ज किया जा सकता है?
नहीं। यह इस बात पर निर्भर करता है कि चेक किसी वैध देनदारी या भुगतान के लिए जारी किया गया था या नहीं।
प्रश्न 2. क्या बिना नोटिस भेजे सीधे कोर्ट जा सकते हैं?
नहीं। धारा 138 के अंतर्गत सामान्यतः पहले कानूनी नोटिस भेजना आवश्यक होता है।
प्रश्न 3. क्या चेक बाउंस होने पर जेल हो सकती है?
यदि न्यायालय आरोपी को दोषी पाता है, तो कानून के अनुसार कारावास, जुर्माना या दोनों का आदेश दिया जा सकता है।
प्रश्न 4. क्या समझौता होने पर मामला समाप्त हो सकता है?
हाँ। यदि दोनों पक्ष सहमत हों और आवश्यक कानूनी प्रक्रिया पूरी हो जाए, तो मामला समाप्त किया जा सकता है।
प्रश्न 5. क्या किसी भी बैंक के चेक पर धारा 138 लागू होती है?
यदि मामला कानून में निर्धारित शर्तों को पूरा करता है, तो संबंधित बैंक का चेक होने पर भी यह प्रावधान लागू हो सकता है।
निष्कर्ष
चेक बाउंस वह स्थिति है जब बैंक किसी चेक का भुगतान करने से इंकार कर देता है। यदि चेक किसी वैध देनदारी के भुगतान के लिए जारी किया गया था, तो परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 की धारा 138 के अंतर्गत कानूनी कार्रवाई की जा सकती है। इस प्रक्रिया में बैंक रिटर्न मेमो, कानूनी नोटिस और आवश्यकता पड़ने पर न्यायालय में शिकायत शामिल होती है।
चेक बाउंस केवल बैंकिंग की समस्या नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण कानूनी विषय भी है। यदि आपका चेक बाउंस हो जाता है, तो घबराने के बजाय सही कानूनी प्रक्रिया अपनाएँ। बैंक से रिटर्न मेमो प्राप्त करें, समय पर कानूनी नोटिस भेजें और आवश्यकता पड़ने पर न्यायालय का सहारा लें। समय-सीमा का पालन और सही दस्तावेज़ सुरक्षित रखना आपके मामले को मजबूत बनाता है।
" यह लेख सिर्फ सामान्य जानकारी के लिए है | किसी विशेष क़ानूनी सलाह के लिए योग्य वकील से परामर्श जरुर करें "


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